Blog Archive

Thursday, November 24, 2016

500 और 1000 के पुराने नोट बंद किए जाने के बाद कश्मीर में मौत का यह पहला मामला बताया जा रहा है

जम्मू। ।
एक बीमार बच्चे के पिता की जेब में 29 हजार रुपये हों, लेकिन उसे इलाज के लिए दर-दर नहीं करीब 30 किलोमीटर भटकने के बाद नाउम्मीदी हाथ लगे और नतीजतन बच्चे की जान चली जाए, तो इस दर्दनाक मंजर को लफ्जों में बयां करना बहुत मुश्किल है।
जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले में मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक बाप अपने बीमार बेटे को कंधे पर लादे भटकता रहा, गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन नोटबंदी की वजह से उसके पुराने नोट लेने को कोई तैयार नहीं हुआ। इस वजह से नौ साल के मासूम को अपनी जान गंवानी पड़ी। 
सांबा के मोहम्मद हारून की दर्दनाक दास्तां
यह दर्दनाक दास्तां जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले की है। जहां 28 साल के मोहम्मद हारून अपने बीमार बच्चे के इलाज के लिए घर से निकले। नजदीकी अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनके बच्चे मुनीर की जान चली गई।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शुक्रवार रात को नौ साल के बीमार मुनीर को अपने कंधे पर लादकर हारून 30 किलोमीटर तक पैदल चले। 500 और 1000 के पुराने नोट बंद किए जाने के बाद कश्मीर में मौत का यह पहला मामला बताया जा रहा है।हारून का कहना है कि मृतक मुनीर दूसरी में पढ़ता था। इस बीच नायब तहसीलदार कुलदीप राज और गोरां पुलिस पोस्ट के इंचार्ज नानक चंद ने इस मामले में मोहम्मद हारून का सोमवार को बयान दर्ज किया था।


सांबा की डीएम शीतल नंदा ने इस मामले में रिपोर्ट तलब की है। डीएम का कहना है कि हारून अपने पुराने नोट बदलने बैंक गया था, लेकिन बच्चे की मौत की वजह नोटबंदी होने से उन्होंने साफ इनकार किया है।


14 नवंबर को बीमार हुआ मुनीर
हारून का कहना है कि उनका बेटा मुनीर 14 नवंबर को बीमार हुआ था। पहले घरेलू नुस्खों से उसके इलाज की कोशिश की गई। हालत बिगड़ने पर उसे मानसर में डॉक्टर के पास ले जाने की तैयारी हुई।उस वक्त परिवार के पास 100 से 150 रुपये ही छोटे नोटों के रूप में थे। इसके अलावा 29 हजार रुपये की कीमत के 500 और एक हजार के पुराने नोट थे। 
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पुराने नोटों को बदलने के लिए हारून आठ किलोमीटर पैदल चलकर खून स्थित जम्मू-कश्मीर बैंक की ब्रांच पहुंचे। लेकिन लंबी लाइन की वजह से उस दिन बारी नहीं आई। 
तीन दिन नोट बदलने के लिए काटे चक्कर
हारून दूसरे दिन सुबह खून से 8-10 किलोमीटर दूर रामकोट गए, लेकिन वहां भी लोगों की भीड़ ज्यादा थी। हारून ने बताया कि उसके 100-150 रुपये तीन दिन तक चक्कर काटने में ही खर्च हो गए।18 नवंबर को जब मुनीर की ज्यादा ही हालात खराब हो गई तो हारून और उनकी पत्नी ने बिना देरी किए उसे अस्पताल ले जाने का फैसला किया। हारून अपनी पत्नी के साथ बेटे को कंधे पर लादकर अपने घर से तीन बजे चले। इसके बाद वे नौ किलोमीटर चलने के बाद आठ बजे के करीब सड़क तक पहुंचे। 
वैन वाले ने पुराने नोट लेने से किया मना
हारून का कहना है, "सडक पर हमने एक वैन ड्राइवर से प्रार्थना की कि वे हमें मानसर पहुंचा दें, उसने हम से 1000 रुपये किराया मांगा, जिसके लिए हम राजी हो गए, लेकिन जब उसने पूछा कि क्या हमारे पास पुराने नोट हैं या नए। उसने पुराने नोट लेने से मना कर दिया। इसके बाद हमने फैसला लिया कि पैदल ही बच्चे को छोटे रास्ते से ले जाएंगे।"इन सबके बीच बहुत वक्त बर्बाद हो गया। सुबह पांच बजे हारून जब डॉक्टर के पास पहुंचे, तब तक मुनीर ने दम तोड़ दिया था।

By:-स्थानीय मीडिया रिपोर्ट

No comments:

Post a Comment